धनबाद: बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय (BBMKU) में दो दिवसीय बहु-विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसमें जैविक नवाचारों के जरिए हरित उद्यमिता और सतत आजीविका को बढ़ावा देने पर व्यापक मंथन हुआ। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीक सीधे किसानों और ग्रामीण समुदायों तक पहुंचे। जिससे गरीबी उन्मूलन, स्वरोजगार और पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा मिल सके।
🔬 जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का साझा मंच
बीबीएमकेयू में जैविक नवाचारों के माध्यम से हरित उद्यमिता और सतत आजीविका का संवर्धन विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। इस आयोजन में जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं जूलॉजी, बॉटनी, बायोटेक्नोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और पर्यावरण विज्ञान को एक साझा मंच पर लाया गया। सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिक शोध को समाज, नीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना था।
🚜 ‘लैब टू लैंड’: प्रयोगशाला की तकनीक पहुंचेगी किसानों के पास
कार्यक्रम के आयोजक प्रो शैलेंद्र कुमार सिन्हा ने कहा कि इस राष्ट्रीय सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य यह है कि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की प्रयोगशालाओं में जो शोध और तकनीक विकसित हो रही है, उसका लाभ सीधे किसानों, ग्रामीण युवाओं, महिलाओं और गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं को एक मंच पर लाकर आजीविका से जुड़े व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत किए गए हैं।
🐟 स्वरोजगार के लिए सरकार को भेजी जाएगी विशेषज्ञों की रिपोर्ट
प्रो शैलेंद्र कुमार सिन्हा ने कहा कि खेती, मछली पालन, लाह उत्पादन, मधुमक्खी पालन, रेशम उद्योग और कुटीर उद्योग जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएं हैं। इस सम्मेलन में विशेषज्ञों के सुझावों और निष्कर्षों को संकलित कर झारखंड सरकार को भेजा जाएगा। ताकि इन्हें गांवों में लागू कर अधिक से अधिक लोगों को स्वरोजगार और स्थायी आय के अवसर उपलब्ध कराए जा सकें।
🌾 टिकाऊ कृषि प्रणाली और आधुनिक तकनीक की जरूरत
चेन्नई से पहुंचे एसोसिएट प्रो डॉ जय जयंती ने कहा कि आज की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि युवाओं को सस्टेनेबल एग्रीकल्चर यानी टिकाऊ कृषि प्रणाली के प्रति जागरूक किया जाए। अगर आधुनिक तकनीकों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वैज्ञानिक पद्धतियों को खेती से जोड़ते हैं, तो कृषि को अधिक लाभकारी और आकर्षक बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि रिसर्च केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचनी चाहिए।
🤝 विज्ञान को समाज और नीतियों से जोड़ने का प्रयास: डॉ अर्चना
भारतीय कृषि संस्थान की डॉ अर्चना कांति दास ने कहा कि हमारा प्रयास है कि विज्ञान को समाज से और शोध को नीतियों से जोड़ा जाए। देशभर के सैकड़ों जिलों में हमारी संस्थाएं कृषि, मत्स्य पालन और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। झारखंड में केज कल्चर तकनीक के माध्यम से मत्स्य पालन में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जिससे आदिवासी और विस्थापित परिवार लाभान्वित हो रहे हैं।
♻️ जैविक खाद और अपशिष्ट प्रबंधन से बढ़ेगी आय
सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के डॉ मंजय प्रसाद सिन्हा ने कहा कि उन्होंने अपनी प्रयोगशाला में कृमि खाद और जैविक अपशिष्ट प्रबंधन पर व्यापक शोध किया है। इसके माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है और रसायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है। किसानों को अगर वैज्ञानिक तरीके से जैविक खाद तैयार करने का प्रशिक्षण मिले, तो वे कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
🛖 कुटीर उद्योग: आत्मनिर्भरता का सशक्त माध्यम
बिलासपुर विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ नरेंद्र कुमार भाटिया ने कहा कि शिल्प आधारित कुटीर उद्योग ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए आय का एक स्थायी माध्यम बन सकते हैं। स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल को आधुनिक बाजार से जोड़कर छोटे स्तर के उद्यम भी बड़े आर्थिक अवसर पैदा कर सकते हैं। हस्तशिल्प और प्राकृतिक उत्पादों के माध्यम से महिलाएं और युवा आत्मनिर्भर बन सकते हैं।


