रायपुर: छत्तीसगढ़ में 1 मई से शुरू होने जा रहा सुशासन तिहार 2026 इस बार केवल एक सरकारी आयोजन नहीं बल्कि बस्तर के बदलते हालात की असली परीक्षा बनकर सामने आ रहा है. विष्णुदेव साय सरकार जहां सुशासन को जन-जन तक पहुंचने का दवा कर रही है, वहीं नक्सल प्रभाव से बाहर निकल चुके बस्तर में अब लोगों की अपेक्षाएं तेजी से बढ़ रही है. दशकों तक भय में जीने वाले आदिवासी ग्रामीण अब खुलकर अपने अधिकार न्याय और विकास की मांग कर रहे हैं. जिससे प्रशासन पर जवाबदेही और परिणाम देने का दबाव पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है.
बदलता बस्तर, डर से संवाद तक का सफर
बस्तर के बदलते इस माहौल को समझना जरूरी है. पहले जहां नक्सलियों के डर से लोग अपनी समस्याएं सामने नहीं रखते थे. वहीं अब वह खुलकर शासन से संवाद कर रहे हैं. यह बदलाव सकारात्मक है. लेकिन इसके साथ यह सवाल भी खड़ा हो रहा है, कि क्या प्रशासन इन बढ़ती अपेक्षाओं पर खरा उतर पाएगा या यह अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा. अभी यह सिर्फ योजनाओं के क्रियान्वयन का नहीं बल्कि भरोसे और पारदर्शिता की परीक्षा बन गया है.
टेस्टिंग टाइम, असली चुनौती शुरू
पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सर्व आदिवासी समाज के प्रदेश अध्यक्ष अरविंद नेताम ने इस स्थिति को टेस्टिंग टाइम बताते हुए कहा कि नक्सलवाद समाप्त होने के बाद असली चुनौती अब शुरू होती है.उनके अनुसार अगर इस दौर में थोड़ी भी गफलत हुई, तो हालात फिर से बिगड़ सकते हैं. उन्होंने स्पष्ट कहा कि सुशासन तिहार को केवल प्रशासनिक कार्यक्रम की तरह नहीं बल्कि सामाजिक संस्कृत और विकास के समन्वय के रूप में लागू करना होगा. जिला प्रशासन की भूमिका इसमें सबसे अहम होगी. क्योंकि जमीनी स्तर पर वही अभियान को सफल या असफल बना सकते हैं.
भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बाधा
अरविंद नेताम ने बस्तर की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार को बताया और कहा कि यह कोई नई समस्या नहीं है बल्कि वर्षों से जमी हुई है. उन्होंने इस बात पर भी निराशा जताई कि ना केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार ने इस मु्द्दे पर ठोस राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखाई है. उन्होंने अमित शाह से भी इस दिशा में पहल की उम्मीद जताई थी, लेकिन वह पूरी होती नहीं दिखी. उनका कहना है कि अगर इस बार भी भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं हुआ तो समाज में गहरी निराशा पैदा हो सकती है.
”अलादीन का चिराग नहीं, योजनाबद्ध विकास की जरूरत”
नेताम ने यह भी कहा कि इतने वर्षों से रुके हुए विकास को अचानक गति देना आसान नहीं है. यह कोई अलादीन का चिराग नहीं है, कि एक झटके में सब कुछ ठीक हो जाए, इसके लिए योजनाबद्ध और दीर्घकालिक राजनीति की जरूरत है, साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि ट्राइबल क्षेत्र में केवल सरकारी कार्यक्रम चलाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि समाज को विश्वास में लेना जरूरी है. स्थानीय लोगों की भागीदारी और उनकी जरूरतों के अनुसार कार्यक्रम बनाना ही इस अभियान में सफलता की कुंजी होगा.
सरेंडर नक्सली और पुनर्वास की चुनौती
नेताम ने यह भी संकेत दिया कि बड़ी संख्या में सरेंडर कर चुके नक्सली और प्रभावित ग्रामीण अब अपनी उम्मीद के साथ सामने आएंगे. ऐसे में सरकार को उनके पुनर्वास और सामाजिक स्वीकार्यता पर विशेष ध्यान देना होगा. इसके साथ ही उन्होंने बस्तर में मनोवैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत भी बताई, ताकि यह समझा जा सके कि नक्सल समस्या के खत्म होने के बाद समाज की मानसिक स्थिति क्या है और लोग भविष्य को लेकर क्या सोच रहे हैं.
”जमीनी सच्चाई 70% पीड़ित अब भी सिस्टम से बाहर”
नक्सल मामलों के जानकारी शुभ्रांशु चौधरी ने बस्तर की जमीनी हकीकत को उजागर करते हुए बताया कि लगभग 70% नक्सल पीड़ितों ने कभी भी सरकार के सामने अपनी शिकायत दर्ज नहीं कराई. डर के कारण लोगों ने ना तो एफआईआर कराई है और ना ही किसी प्रकार की मदद मांगी है. कई मामलों में मृतकों को चुपचाप दफना दिया गया. यह स्थिति बताती है कि बस्तर में असली पीड़ा का बड़ा हिस्सा अब भी सरकारी रिकॉर्ड से बाहर है.
पुराने घावों पर मरहम का मौका
चौधरी का मानना है कि सरकार को ऐसा माहौल बनाना होगा, जिसमें लोग खुलकर अपनी बात रख सके. इसके लिए पुराने मामलों में एफआईआर दर्ज करने और मुआवजा देने के नियम में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि यह सुशासन तिहार पुराने घावों पर मरहम लगाने का एक बड़ा अवसर है, क्योंकि दशकों से दबे हुए दर्द को सामने लाने के लिए भरोसेमंद माहौल जरूरी है.
सलवा जुडूम का संदर्भ और न्याय की जरूरत
उन्होंने सलवा जुडूम के दौर का जिक्र करते हुए कहा कि केवल नक्सलियों ने ही नहीं बल्कि कई बार प्रशासन और पुलिस की ओर से भी गलतियां हुई, जिससे लोगों के साथ अन्याय हुआ. ऐसे में यह जरूरी है कि उन मामलों को भी स्वीकार कर समाधान निकाल जाए. यह समय केवल योजनाओं का नहीं बल्कि न्याय और विश्वास बहाली का भी है.
”2030 का लक्ष्य, अभियान से तय होगी दिशा”
बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार मनीष गुप्ता का कहना है कि अब जब सरकार ने कई क्षेत्रों को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया है, तो वहां शासन की पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है. जो इलाके वर्षों से विकास से दूर रहे, वहां लोगों की आकांक्षाओं के अनुसार योजनाएं लागू करनी होगी. उन्होंने यह भी कहा कि 2030 तक बस्तर को विकसित संभाग बनाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उसकी दिशा इस सुशासन तिहार से काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी.
”जमीनी हकीकत, अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हालात”
हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि बस्तर के कई अंदरूनी इलाकों में अभी भी पूरी तरह सामान्य माहौल नहीं बना है. लोगों को यह विश्वास होने में समय लगेगा कि वे वास्तव में नक्सल मुक्त हो चुके हैं. ऐसे में सरकार को धैर्य और संवेदनशीलता के साथ काम करना होगा. विकास एक दिन में नहीं होगा, बल्कि इसके लिए चरणबद्ध तरीके से योजनाएं लागू करनी होंगी और मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता देनी होगी.
हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि बस्तर के कई अंदरूनी इलाकों में अभी भी पूरी तरह सामान्य माहौल नहीं बना है. लोगों को यह विश्वास होने में समय लगेगा कि वे वास्तव में नक्सल मुक्त हो चुके हैं. ऐसे में सरकार को धैर्य और संवेदनशीलता के साथ काम करना होगा. विकास एक दिन में नहीं होगा, बल्कि इसके लिए चरणबद्ध तरीके से योजनाएं लागू करनी होगी और मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता देनी होगी.
भरोसे और जवाबदेही की असली परीक्षा
सुशासन तिहार 2026, बस्तर में केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि भरोसे, पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा है. यदि सरकार इस अवसर का सही उपयोग करती है और लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ती है, तो यह बस्तर के लिए नई शुरुआत साबित हो सकता है. लेकिन अगर यह केवल औपचारिकता बनकर रह गया, तो बढ़ती उम्मीदें ही सबसे बड़ी निराशा में बदल सकती हैं.
