इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अमरोहा की जिस एफआईआर को रद्द करने से इनकार किया है, वह मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है जिसमें धार्मिक रीति-रिवाज़ों की आड़ में एक नाबालिग लड़की का बार-बार यौन शोषण होता रहा। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने जो टिप्पणी की, वह साफ है- पर्सनल लॉ की आड़ लेकर किसी अपराध से बचा नहीं जा सकता। यह टिप्पणी संक्षिप्त जरूर है, लेकिन (High Court on Halala) इसके पीछे एक लंबी कानूनी और सामाजिक बहस छिपी है, जो सीधे तौर पर संविधान और पर्सनल लॉ से जुड़ी है।
15 साल की उम्र में निकाह और हलाला के नाम पर यौन शोषण
सबसे पहले दर्ज प्राथमिकी के अनुसार घटनाक्रम को समझते हैं। पीड़िता का निकाह महज़ 15 वर्ष की आयु में कराया गया। शादी के बाद उसके साथ मारपीट हुई और कुछ महीनों में तीन तलाक दे दिया गया। इसके बाद जब पति ने दोबारा शादी की इच्छा जताई, तो इस्लामी परंपरा के अनुसार पीड़िता को पहले किसी और पुरुष से निकाह करना और फिर उससे तलाक लेना ज़रूरी बताया गया। इसी प्रक्रिया को हलाला कहा जाता है। आरोप है कि हलाला के नाम पर एक मौलाना द्वारा पीड़िता के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए, जबकि लड़की तब भी नाबालिग थी।
दोबारा हलाला का दबाव और सामूहिक बलात्कार का आरोप
वर्षों बाद जब दोबारा तलाक हुआ, तो उसे बताया गया कि इस बार दो बार हलाला करना होगा, और इसी बहाने फरवरी 2025 में दो लोगों ने कथित तौर पर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। यही वह कड़ी है जिसे अदालत ने सामूहिक बलात्कार के रूप में देखा। अदालत का तर्क कानूनी रूप से बेहद स्पष्ट है। भारत में पॉक्सो (POCSO) अधिनियम कहता है कि 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति के साथ (High Court on Halala) यौन संबंध (चाहे वह सहमति से हो) अपराध की श्रेणी में आता है। यह प्रावधान किसी धार्मिक, सामाजिक या पारिवारिक परंपरा के अपवाद को मान्यता नहीं देता।



